Thursday, October 2, 2008

ऐ ज़िन्दगी तू क्या चाहती है....

ज़िन्दगी तू मुझसे क्या चाहती है,
क्यो हर मोड़ पर मुझे आजमाती है,

में तो सदा तेरी देखाई रहा पर चला हु,
फिर क्यो हर कदम रुलाती है,

जो मैं पुरे मन से चाहता हु,
क्यो वही चीज़ मुझसे दूर चली जाती है,

लगता है अब डर अपने आप से,
अब तो ख्वाब में भी अपनी हार नज़र आती है,

लगता है छोड़ दू हर ख्वाइश का दामन,
फिर क्यो हर रोज एक नई ख्वाइश दिल में जाती है,

जानते है हम उस ख्वाइश के पुरा ना होने पर फिर कही टूट जायेंगे,
पर एक उम्मीद दिल में रहती है,

हर सुबह सूरज की किरण एक नई उमंग देती है,
बस युही ज़िन्दगी हर रोज़ आजमाती है,

ज़िन्दगी तू मुझे क्या चाहती है.........

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