Monday, May 24, 2010

काश ........

क्यों हर चाहत को उसका मुकाम नहीं मिलता,
साँसे तो चलती है पर धड़कन का पता नहीं चलता,

कभी रखा होता उसने मेरे सीने पर सर,
काश कभी उसने मेरी हर धड़कन पर नाम अपना सुना होता,

मेरे हाथो में आज भी उसकी हथेली की हरकत है,
काश कभी उसने भी मेरी हथेली को इतनी शिदत से थामा होता,

ना गुज़रता है कोई पल हमारा उसके बिन,
काश कभी उसने भी किस्सी पल नाम हमारा पुकारा होता,

गुज़ारे है जाने कितने पल हमने साथ उसके,
काश कभी उसका भी कोई पल हमारा होता,

जलते रहे हम रात दिन उससे सोच कर,
काश कभी हमने उसकी चाहत को दिल में लाया ना होता,

उससे दिए हर आंसू का हिसाब चूका रहे है ज़िन्दगी वीरान कर,
काश हमने कभी उसे कोई आंसू रुलाया ना होता,

ना कर पता कोई मुझे उससे जुदा,
काश कभी किसी अजनबी को अपने रिश्ते के बीच लाया ना होता,

जिस पर किया यकीन वो हर रिश्ता झूठा निकला,
काश कभी उसने मुझे यकीन करना सीखाया ना होता,

काश खुदा ने मुझे इश्क करना सिखाया ना होता,
काश वो मेरी ज़िन्दगी में आया ना होता,
काश खुशियों से मेरा रिश्ता इतना पराया ना होता....

काश ....काश .....काश....

काश खुदा ने उससे मेरा खुदा बनाया ना होता..



Wednesday, May 19, 2010

Poet & Poetry

"One who lives what is said in poetry may not be a poet,
and
One who writes the poetry may not be living it"

Thursday, May 13, 2010

घरोंदा

आखों से खवाबो के पंछी जो उडी कभी घरोंदे में वापस ना आये,
आये कितने परिंदे बनाने आशियाना अपना पर खवाब कभी वापस ना आये,
घर तो बना लिया हमने अपना पर फिर वो घरोंदा ना बना पाए.

क्यों देखू में ख्वाब

क्यों देखू में ख्वाब,
की खवाबो की हकीक़त से कोई पहचान नहीं होती,
जो होती पहचान तो ज़िन्दगी यु वीरान नहीं होती,
ना कोई खवाब अधुरा रहता, कोई गम--शामहोती,

क्यों देखू में ख्वाब,
जब उसके पूरा होने की मुझे कोई उम्मीद ही नहीं,
किसी उम्मीद से रही कभी मेरी पहचान भी नहीं,

क्यों सुख गए मेरी आखो के आंसू,
कोई मर गया हर दर्द का एहसास,
क्यों अब कोई ख्वाब मेरी आखो में नहीं,

क्यों कोई ख्वाब मेरी आखो में सजता ही नहीं,
क्यों .... क्यों ..... क्यों.....